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शनिवार, 22 दिसंबर 2018

सिक्ख समाज के स्वाभिमान को सलाम!...

तेज़्ज़न्युज़24.वेब नेटवर्क.संपादकिय दि.22/12/2018.
दावा है कि 'मुसलमान' एक ज़िंदा क़ौम है... और सही है; लेकिन यह 'ज़िंदा' होने का सबूत भारत के मुसलमानों में नहीं मिलता। यहां अव्वल नंबर सिक्खों का आता है। एक प्रधानमंत्री की हत्या करने और खांग्रेस द्वारा एक सिक्ख को प्रधानमंत्री बनाने, उसके द्वारा सिख विरोधी दंगों के लिए देश से माफ़ी मांगने और करोड़ों रुपए का मदत पैकेज देने के बाद भी सिक्ख समाज 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' और उसके बाद के सिख नरसंहार को भूला नहीं है। न ही यह ज़िंदा क़ौम राजीव गांधी की 'जब बड़ा वृक्ष गिरता है तो धरती में कंपन होता ही है!' जैसी प्रतिक्रिया को भूली है। तभी तो 35 साल बाद भी आम आदमी पार्टी के सिख विधायक ने दिल्ली विधानसभा में राजीव गांधी को दिया 'भारतरत्न' सम्मान वापस लेने का प्रस्ताव लाया और उसे पास भी करवाया!!
एक मुट्ठीभर समाज अपने पंथीय परंपराओं को, गुरु के आदेशों को, उसके चेहरे को,उसके लिबास को, उसकी हर अदा को मज़बूती से थामे हुए है। इस समाज की एकता और स्वाभाविक का आलम यह है कि एक ज़माने देश को तोड़कर अलग खलिस्तान बनाने के चाह रखने वाले इस पर कोई भी 'ग़द्दार' या 'आतंकी' का टैग नहीं लगा पाया। किसी संघी की मां नहीं जनी कि सिक्खों की 'घर वापसी' की बात करे या उनकी दाढ़ी-टोपी-कृपाण पर टिप्पणी कर सके...!! कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक सिख अपनी पंथीय पहचान के साथ ससम्मान घूम सकता है। ऐसा नहीं है कि संघी उनसे नफ़रत नहीं करते बल्कि उन्होंने अपनी 'ख़ुदी' को इतनी मज़बूती से पेश किया है कि संघी मजबूर हैं उनका लोहा मानने को...
इसके विपरीत, ज़िंदा क़ौम होने का दावा करने वाले मुस्लिम समाज का हाल है। उधर स्वर्णमंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ,इधर बाबरी मस्जिद तोड़ी गयी, उधर 1984 हुआ,इधर भागलपुर, हाशिमपुरा, अहमदाबाद, आसाम, बंबई, गुजरात, मुज़फ्फरनगर... न जाने क्या क्या हुआ; मगर तथाकथित 'जागृत' मुसलमानों ने न कोई प्रतिक्रिया दी, न राजनीतिक बदला लिया, न सबक लेकर ख़ुद मज़बूत हुए और न ही अपनी मज़हबी पहचान को, नबी (स.) के आदेशों को मज़बूती से थामा... हाँ! धर्म के अंदर अलग विचारधाराओं (फ़िरक़ों) को इतनी मज़बूती से थामा है कि आज हर फ़िरक़ा दूसरे फ़िरके के लिए मुश्रिक, क़ाफ़िर, मुनाफ़िक़ है! शिद्दत इतनी की मस्जिद में जाने, क़ब्रस्तान में दफ़नाने को तक शर्तें लागू और नफ़रतें इतनी कि भिन्न विचारधारा वाला मुर्दा भी क़ब्र से निकालकर फेंक रहे हैं...

जावेद पटेल कि वाल से.

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