सऊदी अरब पर यमन के हुसी आंदोलन कारीयोने किए मिसाईली हमले.
यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन ने जिसे हूसी आंदोलन भी कहा जाता है गत सोमवार की सबह सऊदी अरब पर सात मिसाइल फ़ायर किए।
तीन मिसाइल सऊदी अरब की राजधानी रियाज़ पर मारे गए, एक मिसाइल ख़मीस मुशैयत शहर पर फ़ायर किया जहां सऊदी अरब की बड़ी सैनिक छावनी है, एक मिसाइल दक्षिणी सऊदी अरब के नजरान शहर पर, दो मिसाइल जीज़ान शहर पर फ़ायर किए जो यमन की सीमा के सामने स्थित है।
यह सात मिसाइल फ़ायर करने के लिए समय का चयन बहुत ध्यान से किया गया था। यह कार्यवाही अंसारुल्लाह आंदोलन के प्रमुख सैयद अब्दुल मलिक अलहौसी के उस भाषण के कुछ ही घंटों बाद अंजाम दी गई जो उन्होंने यमन पर सऊदी अरब और इमारात के गठबंधन के हमले की शुरुआत को तीन साल पूरे होने पर दिया और जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बहुत जल्द सामरिक स्तर पर वह क़दम उठाए जाएंगे जो सबको चौंका देंगे। इसके साथ ही उन्होंने राजधानी सनआ के सबईन स्क्वायर पर प्रदर्शन की दावत दी जिसमें लाखों की संख्या में लोगों ने भाग लिया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में सैयद अब्दुल मलिक अलहौसी की तसवीरें थीं और लोग हमले का मुक़ाबला करने और क़ुरबानियां देने संबंधी नारे लगा रहे थे।
इस समय यमन के पटल पर अंसारुल्लाह आंदोलन सबसे अधिक शक्तिशाली राजनैतिक व सैनिक ताक़त है यह बात सबईन स्वायर के प्रदर्शनों में भी साफ़ तौर पर नज़र आई।
सऊदी अरब की राजधानी पर तीन मिसाइल फ़ायर किया जाना बहुत सोची समझी योजना का नतीजा है यह सऊदी अरब की शांति व स्थिरता को हिला देने वाली योजना है जिसने सऊदी अरब के लोगों में भय फैला दिया है जो पिछले आठ दशकों से हर प्रकार के युद्ध और लड़ाई से सुरक्षित थे क्योंकि सऊदी अरब ने सारी लड़ाइयां अपनी सीमा के बाहर और प्राक्सी वार के रूप में लड़ी हैं। सऊदी अरब में यह नई स्थिति इन मिसाइलों ने पैदा की है जो लंबी दूरी पर अपने निशाने को सफलता के साथ ध्वस्त कर रही हैं।
राजधानी का महत्व बहुत अधिक होता है और राजधानी किसी भी सरकार की मज़बूती का चिन्ह होती है। यह बात अंसारुल्लाह आंदोलन को अच्छी तरह पता है और इसी लिए वह बार बार रियाज़ को निशाना बना रहे हैं। सऊदी अरब का तो दावा है कि उसने सारे मिसाइल अपने पैट्रियट मिसाइलों की मदद से मार गिराए लेकिन एसोशिएटेड प्रेस ने अमरीकी विशेषज्ञों की राय प्रकाशित की है जिसके अनुसार यमन से फ़ायर किए गए सारे मिसाइल अपने निशाने पर लगे हैं।
सऊदी अरब के घटक देशों ने जिनमें कुछ अरब और कुछ ग़ैर अरब देश शामिल हैं जिस तरह इस हमले की निंदा की है और चिंता जताई है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि सऊदी अरब के भीतर और बाहर भय फैल चुका है। वर्तमान युद्ध में यदि अंसारुल्लाह आंदोलन विजयी नहीं हुआ तो यह भी सच्चाई है कि वह युद्ध हारा भी नहीं है और न घुटने टेके हैं। क्योंकि यमन पर सऊदी अरब के हमले को तीन साल पूरे हो जाने के बाद भी सनआ अंसारुल्लाह के ही नियंत्रण में है और इस आंदोलन के संघर्षकर्ताओं ने सऊदी अरब की सीमा पर अपने हमलों से सऊदी सैनिकों को हालत ख़राब कर रखी है। सऊदी अरब और उसके घटक इस तथ्य को अगर सही प्रकार समझ लें तो इस दलदल से बाहर निकलने का उन्हें रास्ता भी समझ में आ जाएगा।
फ़ाइनैन्शियल टाइम्ज़ ने अपने रिपोर्ट में सऊदी अधिकारियों के हवाले से कहा है कि तीन साल में यमन युद्ध पर सऊदी अरब के कम से कम 120 अरब डालर ख़र्च हो चुके हैं जबकि इस युद्ध से सऊदी अरब को जो राजनैतिक नुक़सान पहुंचा है उसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि 120 अरब डालर से कहीं अधिक रक़म यमन युद्ध पर ख़र्च हो चुकी है।
अंसारुल्लाह ने सऊदी अरब के बड़े शहरों पर 100 से अधिक मिसाइल फ़ायर किए हैं। एक मिसाइल को गिराने के लिए सऊदी अरब को पांच से सात पैट्रियट मिसाइल फ़ायर करने पड़ते है और हर पैट्रियट मिसाइल की क़ीमत 5 से 7 मिलियन डालर है। इस देखा जाए तो सऊदी अरब 70 करोड़ डालर के तो केवल पैट्रियट मिसाइल फ़ायर कर चुका है। इसके अलावा सऊदी अरब तीन साल से यमन पर जो बमबारी कर रहा है और वहां जो मिसाइल तथा अन्य हथियार प्रयोग कर रहा है वह तो अलग ही है। यह सारे हथियार सऊदी अरब ने पश्चिमी देशों से भारी क़ीमत अदा करके ख़रीदे हैं। बाद में भी यमन को पहुंचने वाले नुक़सान का हर्जाना सऊदी अरब को ज़रूर देना पड़ेगा।
युद्ध को तीन साल पूरे होने के बाद अब सऊदी अरब के भीतर आम जनता के स्तर पर कोई भी यह बात मानने को तैयार नहीं है कि यमन युद्ध को सैनिक मार्गों से जीता जा सकता है लेकिन साथ ही सऊदी अरब में किसी के पास कोई राजनैतिक रोडमैप भी नहीं है जिससे सऊदी अरब इस संकट से बाहर निकल सके। हम यह समझते हैं कि अब जो 7 मिसाइल फ़ायर किए गए हैं इनसे सऊदी अरब पर वार्ता के लिए दबाव बढ़ेगा। सऊदी अरब का दावा रहा है कि यमन संकट का हल रियाज़ में है और अंसारुल्लाह का कहना है कि यह संकट सनआ में वार्ता से हल होगा तो अब बेहतर है कि दोनों पक्षों को कुवैत या ओमान में वार्ता के लिए तैयार किया जाए। शायद यमन के मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ के नए दूत मार्टिन ग्रेविथ का सबसे कठिन मिशन यही हो।
यमन संकट का चौथा साल पिछले वर्षों से बिल्कुल अलग होगा। इस साल में बहुत सी चौंकाने वाली घटनाएं होंगी। एक बड़ा बदलाव यह भी है कि सऊदी अरब ने यमन युद्ध के लिए जो गठबंधन बनाया था उसमें व्यवहारिक रूप में अब सऊदी अरब और इमारात के अलावा कोई नहीं बचा है जबकि सऊदी अरब और इमारात के बीच आपसी विवाद भी बहुत बढ़ चुका है।
अंसारुल्लाह आंदोलन कह रहा है कि अगर सऊदी अरब ने यमन पर बमबारी रोकी तो वह जवाब में रियाज़ पर मिसाइल हमले बंद कर देंगे। शायह यही समीकरण उस वार्ता का सबसे प्रमुख एजेंडा होगा जो संभावित रूप से अब बहुत क़रीब आ गई है। वैसे आगे की बातें तो ईश्वर ही बेहतर जानता है।

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